Chapter 3: विचार का जन्म
मैं अक्सर सोचता हूँ कि एक विचार का जन्म कैसे होता है। यह कोई अचानक घटने वाली घटना नहीं होती, बल्कि यह अनुभवों, अवलोकनों और एक गहरे विश्वास का परिणाम होता है। आज मैं आपसे अपनी उस यात्रा को साझा करना चाहता हूँ, जहाँ मैंने 60-30-10 के concept को पहली बार सोचा और उसे The Base Neo School, Haldwani के foundation में ढाला। यह कहानी केवल मेरे अनुभवों की नहीं, बल्कि उन बच्चों की भी है, जिन्हें मैंने देखा, समझा और जिनके भविष्य को एक नई दिशा देने का सपना देखा।
अनुभवों से सीखा
मैंने शिक्षा के क्षेत्र में कई साल बिताए हैं। St. Lawrence Sr. Sec. School की legacy को आगे बढ़ाते हुए मैंने देखा कि बच्चे कितने curious होते हैं। उनकी आँखों में सवाल होते हैं, उनके दिमाग में सपने होते हैं। लेकिन मैंने यह भी देखा कि हमारी पारंपरिक शिक्षा प्रणाली अक्सर उनकी इस curiosity को सीमित कर देती है। मैं सोचने लगा कि क्या हम बच्चों को केवल किताबी ज्ञान दे रहे हैं, या वाकई उनके भीतर की creativity और problem-solving skills को जगा रहे हैं? यहीं से मेरे मन में एक सवाल उठा—क्या हम बच्चों को शुरू से ही entrepreneurship का mindset दे सकते हैं?
मैंने देखा कि बच्चे naturally risk-takers होते हैं। वे बिना डर के नई चीजें आजमाते हैं। एक दिन मैंने एक छोटे से बच्चे को देखा, जो अपनी छोटी सी दुकान का नाटक कर रहा था। उसने कुछ पत्थरों को “सामान” बनाया और अपने दोस्तों को “बेच” रहा था। यह देखकर मुझे एहसास हुआ कि entrepreneurial thinking बच्चों में पहले से ही मौजूद होती है, बस हमें इसे सही दिशा देनी है।
60-30-10 का जन्म
मैंने सोचना शुरू किया कि बच्चों के brain development को कैसे maximize किया जा सकता है। मैंने research की और पाया कि 90% brain development 5 साल की उम्र तक हो जाता है। यह वह समय होता है जब बच्चे सबसे ज्यादा सीखते हैं। लेकिन हमारे education system में इस उम्र में केवल basic learning पर ध्यान दिया जाता है। मैंने सोचा, क्यों न इस golden period का उपयोग करके बच्चों को entrepreneurial skills सिखाई जाएँ?
यहीं से मेरे मन में 60-30-10 का idea आया। मैंने सोचा कि अगर हम बच्चों की शिक्षा को तीन हिस्सों में बाँटें—60% practical learning, 30% conceptual understanding, और 10% theoretical knowledge—तो हम एक balanced approach बना सकते हैं। यह formula मेरे लिए केवल एक ratio नहीं था, बल्कि एक philosophy थी। मैं चाहता था कि बच्चे किताबों से ज्यादा real-world experiences से सीखें। उदाहरण के लिए, mathematics को business calculations के साथ जोड़ना, language को communication skills के साथ, और science को innovation के साथ।
JEP की शुरुआत
जब मैंने इस concept को The Base Neo School में लागू करने का फैसला किया, तो मैंने इसे JEP approach के साथ जोड़ा। JEP हमारे लिए केवल एक method नहीं, बल्कि एक vision है। हम चाहते हैं कि हर बच्चा 3 साल की उम्र से ही entrepreneurship की mindset के साथ बड़ा हो। हमारी tagline—“Entrepreneurship Starts at 3, Not at 30!”—इसी सोच को दर्शाती है।
मैंने देखा कि जब हमने बच्चों को practical tasks दिए, जैसे कि एक mock market बनाना या एक small project को manage करना, तो उनकी confidence में गजब का इजाफा हुआ। वे न केवल सीख रहे थे, बल्कि enjoy भी कर रहे थे। यह देखकर मुझे यकीन हो गया कि 60-30-10 का मेरा idea सही दिशा में है।
माता-पिता और शिक्षकों के लिए संदेश
मैं सभी माता-पिता और शिक्षकों से कहना चाहूँगा कि बच्चों के शुरुआती साल उनके भविष्य की नींव होते हैं। हमें उनकी curiosity को मारना नहीं, बल्कि उसे पंख देना है। हमें उन्हें केवल doctor, engineer या scientist बनने के लिए तैयार नहीं करना, बल्कि एक confident leader, एक creative thinker, और एक problem-solver बनाना है।
- बच्चों को practical experiences दें—उन्हें छोटे-छोटे projects करने दें।
- उनके सवालों को encourage करें, भले ही वे कितने भी अजीब हों।
- उन्हें failure से डरना नहीं सिखाएँ, बल्कि उससे सीखना सिखाएँ।
Children are born entrepreneurs; we just need to give them the right environment to flourish.
मेरा सपना
मेरा सपना है कि The Base Neo School से निकलने वाला हर बच्चा न केवल academically strong हो, बल्कि life skills में भी माहिर हो। मैं चाहता हूँ कि हमारे बच्चे भविष्य में नौकरी माँगने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनें। 60-30-10 का यह concept और JEP approach मेरे लिए बस एक शुरुआत है। मैं जानता हूँ कि यह रास्ता आसान नहीं होगा, लेकिन जब मैं बच्चों की मुस्कुराहट और उनकी achievements देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि यह सब मेहनत इसके लायक है।
आप सभी से मेरा अनुरोध है कि हम मिलकर बच्चों के भविष्य को एक नई दिशा दें। आइए, हम उन्हें केवल पढ़ने-लिखने की मशीन न बनाएँ, बल्कि एक creative और innovative इंसान बनाएँ। मैं विश्वास करता हूँ कि अगर हम बच्चों को सही guidance और environment दें, तो वे कुछ भी हासिल कर सकते हैं।
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